List of top Questions asked in CBSE CLASS XII

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी "परचेजिंग पावर" के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति – शीतलन शक्ति, व्यंजन की शक्ति ही बाजार को देते हैं। न तो वे बाजार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाजार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजारीकरण बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि मूल्य बढ़ाना है। वस्तु की बढ़ती का अर्थ वस्तु में गुणों की घटती है। इस समष्टि में जब तक आदमी आपस में भाई-भाई और बहनें और पड़ोसी फिर से नहीं बन जाते हैं और आपस में खरीद और बेचने (क्रय-विक्रय) की तरह व्यवहार करते हैं। मानो दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दिखाई दे। और यह बाजार का, बल्कि इतिहास का, सत्य माना जाता है। ऐसे बाजार की बीच में लेकिन लोगों में आवश्यकताएँ तो असीमित नहीं होतीं; बल्कि शोषण होने लगता है। तब बाजार सशक्त होता है, विकृत विकराल होता है। ऐसे बाजार मानवता की निर्मिति विफल कर देंगे जो उचित बाजार का पोषण करता हो, जो सच्चा लाभ करता हुआ हो; वह शोषणरससिक्त और वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनैतिक-शास्त्र है।

निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए —

सिमटा पंख साँझ की लालि
जा बैठी अब तक शाखों पर
ताम्रपर्ण पीपल से, श्याममुख
झरते चंचल स्वर्णिम निर्झर !

ज्योति रश्मि-सा धंध सरिता में
सूर्य निमित्त हुए होता ओझल,
बुद्धि बिन्धा विश्रान्त केतकी-सा
लगता वितस्क्रमा गंगाजल !

धूपछाँह के रंग की रति
अमित ज्योतिर्मयी से संपृक्त
नील लहरियों में लोचित
पीला जल जल जलद से विभक्त !

सिक्तता, सशिल, समीप स्रता से
स्नेह पाश में बंधे सुमृदुज्वल,
अमित पिपासित सशिल, सशिल
ज्यों गति त्रव खो बन गया लवोचल

शंख घंट उपने मंथन में
लयों में होता एक संगम,
दीप शिखा-सा उद्गार कल्पना
नभ में उठकर करता नीराजन !

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :

संवेदनशील व्यक्तियों में एक गुण उनका है जिसकी वृत्ति लेखन है। लेखक कोई मनोरंजनप्रिय नहीं है। इसमें विचारों से जुड़ना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए शब्द के सीमित संसार में अपनी भाषा को शब्दों में उतारना कष्टदायक भी हो जाता है। मगर जो अनुभूति, पीड़ा, हृदयस्पर्शी लेखन के हृदय में उमड़ता है, उसका अभिव्यक्त किया ही जाता है, भले ही पाठक कम हों या न हों। लेखक की एक कहानी में नायक लेखक है जिसकी कहानियों को कोई विशेष नहीं सुनता, मगर हर शाम वह घर लौटते वक्त घोड़े को अपनी कहानी सुनाता है। अनेक सृजनशील लेखकों के आरंभिक दौर में पाठक-प्रकाशक नहीं मिलते, किंतु वे निराश या गर्व में नहीं डूबते। जिनके पास कुछ ठोस कहन-लिखन की है, वे कभी चुनी हुई यात्राएँ नहीं थामते।

सृजन हलचल के अभिसरण नहीं है। यह कार्य पारंपरिक शक्तियों का है। लेखक कर्मठ नहीं माने गए हैं, जिसमें निवेदन के लिए अनुराग, निरंतरता और धैर्य आवश्यक होते हैं। आज सूचना के प्रसार में अद्वितीय बुद्धि में अधिक तीव्रता हो जाने से नए अर्थ नहीं लगाए जाने चाहिए कि लेखन, विचार और लिखित शब्द की गरिमा क्षीण हो रही है, बल्कि लिखने वालों पर यह दबाव है, कि समय का रास्ता बदल रहा है। डिजिटल तकनीक के प्रसार में जानने, सीखने, समझने के लिए आवश्यक जनों का स्थान पढ़ने-लिखने के बजाय बोलने-सुनने पर अधिक है। जब दुनिया अध्यात्मिकता की ओर बढ़ रही हो, तो लेखक-पाठक पुरानी शैली में कैसे हो सकते हैं।

पाठकों को भी कम्प्यूटर साधन अनुकूल और सुविधाजनक लगते हैं। मगर इससे लेखन की भूमिका गौण नहीं हुई है। नए विचारों की आवश्यकता बनी रहेगी। लेखक-पाठक का मुँहबंद शब्द के प्रति समर्पण कमतर नहीं हुआ है, उनके कहे-लिखे की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिह्न नहीं उठेंगे और न उठे।

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
भारतेन्दु-मंडल की किसी सजीव स्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्कंठा रही होगी, यह अनुमान करने की बात है। मैं नगर से बाहर रहता था। एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई। जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे, वे अगुवा हुए। मील डेढ़ मील का सफर तय हुआ। पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए। नीचे का बरामदा खाली था। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत्त था। बीच-बीच में खंबे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर पीछे एक लड़के ने ऊँगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। ....... बस, यही पहली झाँकी थी।

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
किंतु यह भ्रम है... यह बाढ़ नहीं, पानी में डूबे धान के खेत हैं। अगर हम थोड़ी सी हिम्मत बटोरकर गाँव के भीतर चलें, तब वे औरतें दिखाई देंगी जो एक पाँव में झुकी हुई धान के पौधे छप-छप पानी में रोप रही हैं; सुंदर, सुघड़, धूप में चमकमारती काली रंगत और सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हैट, जो फ़ोटो या फ़िल्मों में देखे हुए वियतनामी या चीनी औरतों की याद दिलाते हैं। ज़रा-सी आहट पाते ही वे एक साथ सिर उठाकर चौकी हुई निगाहों से हमें देखती हैं — बिल्कुल उन युवा हिरणियों की तरह, जिन्हें मैंने एक बार कान्हा के वन्यस्थल में देखा था। किंतु वे डरती नहीं, भागती नहीं, सिर्फ़ विस्मय से मुस्कराती हैं और फिर सिर झुकाकर अपने काम में डूब जाती हैं... यह सम्पूर्ण दृश्य इतना साफ़ और सजीव है — अपनी स्वच्छ मासूमियत में इतना संपूर्ण और शाश्वत — कि एक क्षण के लिए विश्वास नहीं होता।