निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
अहिंसा का दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है और हिंसा का दूसरा रूप या दूसरा नाम स्वार्थ है, जो प्रायः भोग के रूप में हमारे सामने आता है। पर हमारी सभ्यता ने तो भोग भी त्याग से निकाला है और भोग भी त्याग में ही पाया जाता है। श्रुति कहती है — 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:'। इसी के द्वारा हम व्यक्ति–व्यक्ति के बीच का विरोध, व्यक्ति और समाज के बीच विरोध, समाज और समाज के बीच का विरोध, देश और देश के बीच के विरोध को मिटाना चाहते हैं। हमारी सारी नैतिक चेतना इसी तत्व से ओत–प्रोत है।