सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके इसलिए खोंसे ताकि वह उसे एक संत या महात्मा का रूप दे सके। घास का तिनका मुँह में रखना संतों और साधुओं की एक पहचान मानी जाती है, जो उनकी अहिंसा और सादगी का प्रतीक होता है।
ऐसा करके सियार यह सिद्ध करना चाहता था कि बाहरी रूप-रंग और दिखावे से कोई भी व्यक्ति संत बन सकता है। चाहे वह अंदर से कितना भी क्रूर, लालची या शोषक क्यों न हो, यदि वह बाहरी तौर पर साधु का वेश धारण कर ले तो लोग उसे संत समझने लगते हैं। सियार व्यंग्यात्मक ढंग से यह दिखाना चाहता था कि इस समाज में दिखावे और ढोंग का बोलबाला है। वास्तविक गुणों से अधिक महत्व बाहरी आडंबरों को दिया जाता है।