सेठानी ने सेठ जी के उस कार्य को महायज्ञ बताया था जब उन्होंने एक गरी� ब्राह्मण को भूखा देखकर अपने खाने की थाली उसे दे दी थी और स्वयं भूखे रह गए थे।
सेठ ने अपने इस कार्य को महायज्ञ इसलिए नहीं माना क्योंकि उनके अनुसार यज्ञ तो वह होता है जिसमें आहुति दी जाती है, हवन किया जाता है और पंडित बुलाए जाते हैं। उन्होंने तो केवल एक भूखे व्यक्ति को भोजन करा दिया था, जिसे वे कोई बड़ा कार्य नहीं मानते थे।
इस कार्य से सेठ जी के स्वभाव की यह विशेषता स्पष्ट होती है कि वे विनम्र, दयालु और परोपकारी थे। वे अपने अच्छे कार्यों को बड़ा कार्य नहीं मानते थे और दूसरों की पीड़ा को समझने वाले संवेदनशील व्यक्ति थे।