'महायज्ञ का पुरस्कार' कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा यज्ञ या पुण्य दिखावे के लिए किए गए बड़े-बड़े अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि किसी भूखे को भोजन कराने, किसी जरूरतमंद की मदद करने जैसे छोटे-छोटे मानवीय कार्यों में निहित है। ईश्वर को दिखावे की नहीं, सच्चे मन से किए गए अच्छे कर्मों की आवश्यकता है।
इस कहानी में मुझे सेठ जी का पात्र सबसे अच्छा लगा। वे अपने इन गुणों के कारण प्रभावित करते हैं:
विनम्रता: वे अपने अच्छे कार्य को बड़ा नहीं मानते।
दयालुता: उन्होंने भूखे ब्राह्मण को देखकर तुरंत अपना भोजन दे दिया।
सरलता: वे दिखावे से दूर, सीधे-सादे व्यक्ति हैं।
ईमानदारी: वे अपनी आर्थिक स्थिति को स्वीकार करते हैं और झूठा दिखावा नहीं करते।