'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग "बलिदान" अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक है। इसमें कवि ने चन्द्रशेखर आज़ाद के अंतिम संघर्ष और उनके अद्भुत बलिदान का चित्र प्रस्तुत किया है। यह सर्ग केवल एक घटना का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की महान गाथा का प्रतीक है।
कथावस्तु का विस्तार:
तृतीय सर्ग में बताया गया है कि अंग्रेज सरकार चन्द्रशेखर आज़ाद से भयभीत थी और उन्हें पकड़ने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी। वे अपने साथियों के साथ निरंतर गुप्त योजनाएँ बनाते और क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाते रहे। आज़ाद की बहादुरी और नेतृत्व के कारण अंग्रेज सरकार उन्हें किसी भी कीमत पर पकड़ना चाहती थी।
27 फरवरी 1931 का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम और भावुक दिन है। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आज़ाद अकेले ही अंग्रेजों से घिर गए। पुलिस ने उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा, परंतु आज़ाद ने कहा कि वे "आज़ाद" पैदा हुए हैं और "आज़ाद" ही मरेंगे। उन्होंने अपनी पिस्तौल से गोलियाँ चलाकर अनेक पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया। लंबे संघर्ष के बाद जब पिस्तौल की अंतिम गोली बची, तब उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय उस गोली को स्वयं पर दागकर मातृभूमि के लिए बलिदान दे दिया।
संदेश और महत्व:
यह सर्ग केवल चन्द्रशेखर आज़ाद की शौर्यगाथा नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय युवाओं के लिए संदेश है कि देश के लिए प्राण न्यौछावर करना ही सच्चा जीवन है। कवि ने इसे बलिदान की ऐसी गाथा बताया है जिससे राष्ट्र की आत्मा सदैव प्रेरित होगी।
निष्कर्ष:
तृतीय सर्ग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रसंग है। यह हमें त्याग, साहस और देशभक्ति का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत करता है। चन्द्रशेखर आज़ाद का बलिदान सदैव भारतवासियों को स्वतंत्रता की रक्षा हेतु प्रेरित करता रहेगा।