'हास्य रस' हिंदी साहित्य के नौ रसों में से एक है, जो मानव के आनंद, विनोद और मनोरंजन की भावना को व्यक्त करता है। हर रस किसी न किसी स्थायी भाव पर आधारित होता है — जैसे करुण रस का स्थायी भाव शोक है, रौद्र रस का क्रोध, और इसी प्रकार हास्य रस का स्थायी भाव हास होता है।
'हास' का अर्थ है हँसी या प्रसन्नता। जब किसी व्यक्ति की चेष्टाएँ, वाणी, या व्यवहार हास उत्पन्न करते हैं, तब उसमें हास्य रस का उद्भव होता है। यह रस व्यक्ति के मन को हल्का, प्रसन्न और आनंदित बनाता है।
हास्य रस दो प्रकार का माना गया है — (1) आत्म-हास्य और (2) पर-हास्य। आत्म-हास्य में व्यक्ति स्वयं पर हँसता है, जबकि पर-हास्य में दूसरों की विचित्रता पर। कवियों ने हास्य रस का उपयोग समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य और आलोचना करने के लिए भी किया है।
अतः स्पष्ट है कि 'हास्य रस' का स्थायी भाव हास है, जो आनंद और विनोद का प्रतीक है।