'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में कवि ने गाँधीजी के जीवन के उस चरण का वर्णन किया है जब वे राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत हैं। यह सर्ग भावनात्मक और प्रेरणादायक दोनों है।
1. मुख्य प्रसंग: इस सर्ग में गाँधीजी को 'मुक्तिदूत' — अर्थात् मुक्ति के संदेशवाहक के रूप में चित्रित किया गया है। वे भारत की स्वतंत्रता के लिए जनता को एकजुट करने का कार्य करते हैं।
2. देशप्रेम और बलिदान: कवि ने वर्णन किया है कि गाँधीजी ने देश की स्वतंत्रता के लिए जेल, यातना और अपमान सब कुछ सहा, परन्तु अपने सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं हुए।
3. नैतिक बल का प्रभाव: गाँधीजी ने सत्य, अहिंसा और आत्मबल के माध्यम से अंग्रेजों की शक्ति को चुनौती दी। उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक उत्थान भी था।
4. काव्य का संदेश: चतुर्थ सर्ग में कवि का संदेश स्पष्ट है कि सच्ची मुक्ति केवल बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक बंधनों — लोभ, हिंसा और असत्य — से मुक्ति में है। गाँधीजी इसी 'आत्मिक स्वतंत्रता' के प्रतीक हैं।
निष्कर्ष:
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य का चतुर्थ सर्ग गाँधीजी के जीवन, संघर्ष और त्याग की गाथा है, जो सम्पूर्ण मानवता को शांति, प्रेम और कर्मयोग का संदेश देता है।