'कर्ण' खण्डकाव्य का 'षष्ठ सर्ग' अत्यंत मार्मिक और करुणापूर्ण सर्ग है। इस सर्ग में महाभारत के प्रसिद्ध प्रसंग — कर्ण वध — का वर्णन किया गया है। कवि ने इसे केवल युद्ध की घटना के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं और नियति के संघर्ष के रूप में चित्रित किया है।
1. मुख्य प्रसंग: कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने-सामने होते हैं। दोनों ही महान योद्धा हैं, परंतु परिस्थितियाँ कर्ण के प्रतिकूल होती हैं। उसके रथ का पहिया धरती में धँस जाता है, फिर भी वह वीरता से संघर्ष करता है।
2. नियति का खेल: कर्ण के साथ उसका समस्त जीवन नियति द्वारा परीक्षा में रहा। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे अपमान, वंचना और संघर्ष का सामना करना पड़ा। युद्ध के समय जब वह अस्त्र-संधान में व्यस्त था, तभी अर्जुन ने श्रीकृष्ण के संकेत पर उसे बाण से मार दिया। यह घटना अन्याय और नियति की विडंबना का प्रतीक बन जाती है।
3. भावनात्मक पक्ष: कवि ने इस सर्ग में कर्ण के वीरता के साथ-साथ उसकी करुणा और त्याग की भावना को भी चित्रित किया है। उसकी मृत्यु केवल शरीर की नहीं, बल्कि एक महान आदर्श के अंत का प्रतीक है।
4. निष्कर्ष: 'षष्ठ सर्ग' कर्ण के अद्वितीय जीवन का अंत प्रस्तुत करता है, जो पराक्रम, त्याग और करुणा का अद्भुत संगम है। यह सर्ग पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है।