'कर्ण' खण्डकाव्य का नायक कर्ण भारतीय साहित्य का एक अद्वितीय और करुण नायक है। कवि ने उसके चरित्र में वीरता और त्याग — दोनों का समन्वय दिखाया है।
1. वीरता: कर्ण जन्म से सूर्यपुत्र था और असीम शक्ति का धनी था। वह रणभूमि का अपराजित योद्धा था। अनेक बार उसने अपने शौर्य और युद्ध-कौशल से पांडवों को पराजित किया। विपरीत परिस्थितियों में भी उसने युद्ध से पलायन नहीं किया।
2. त्याग: कर्ण का जीवन त्याग और दान का प्रतीक था। उसने अपने जीवन में कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। कवच और कुंडल का दान देकर भी उसने स्वयं को मृत्यु के निकट ला दिया, फिर भी उसके मन में दान की भावना बनी रही।
3. निष्ठा और आदर्श: दुर्योधन के प्रति उसकी मित्रता और निष्ठा उसकी सबसे बड़ी पहचान थी। यद्यपि उसे बाद में ज्ञात हुआ कि पांडव उसके भाई हैं, फिर भी उसने धर्म और कर्तव्य के पालन हेतु दुर्योधन के प्रति अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी।
4. निष्कर्ष: कर्ण की वीरता और त्याग उसे एक 'महानायक' का दर्जा देते हैं। वह न केवल योद्धा था, बल्कि न्यायप्रिय, उदार और आत्मबलिदानी भी था। उसका चरित्र मानवता के सर्वोच्च आदर्शों का प्रतीक है।