कर्ण 'महाभारत' के उन प्रमुख पात्रों में से हैं जिनका जीवन संघर्ष, वीरता और करुणा से भरा हुआ है। कवि श्यामनारायण पांडेय ने 'कर्ण खंडकाव्य' में उनके व्यक्तित्व को वीरता, दानशीलता और आत्मगौरव का प्रतीक बताया है।
1. वीरता: कर्ण युद्धभूमि के महान योद्धा थे। उन्होंने अर्जुन, भीम और अन्य पांडवों से निर्भीक होकर युद्ध किया। उनकी युद्धकला और धनुर्विद्या की कोई तुलना नहीं थी। कठिन परिस्थितियों में भी वे कभी विचलित नहीं हुए।
2. दानशीलता: कर्ण का दूसरा नाम 'दानवीर' है। उन्होंने कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। कवच-कुण्डल दान इसका सर्वोच्च उदाहरण है।
3. त्याग और स्वाभिमान: कर्ण ने सदैव अपने जन्म और समाज द्वारा मिले अपमान को सहा, परंतु अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने दुर्योधन का साथ केवल मित्रता और कृतज्ञता के कारण दिया।
4. मानवीयता और करुणा: कर्ण का हृदय करुणा से भरा था। वे शत्रु के प्रति भी सम्मान और दया का भाव रखते थे।
निष्कर्ष:
कर्ण का व्यक्तित्व संघर्ष और महानता का प्रतीक है। वे ऐसे योद्धा थे जिन्होंने वीरता, दानशीलता और आत्मगौरव के आदर्श स्थापित किए और सच्चे अर्थों में 'महाभारत का नायक' कहलाए।