'जय सुभाष' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग सुभाष चन्द्र बोस के भारत से पलायन और आज़ाद हिन्द फ़ौज के गठन की घटनाओं पर आधारित है। इसकी कथावस्तु इस प्रकार है:
कारावास और अनशन: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज सरकार सुभाष चन्द्र बोस को भारत-रक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर जेल में डाल देती है। जेल में वे आमरण अनशन प्रारम्भ कर देते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।
नजरबंदी: सरकार घबराकर उन्हें जेल से रिहा कर देती है, परन्तु उन्हें कलकत्ता में उनके घर पर ही कठोर पहरे में नजरबन्द कर दिया जाता है।
देश से पलायन की योजना: सुभाष बाबू यह समझते हैं कि देश में रहकर स्वतंत्रता-संग्राम को गति नहीं दी जा सकती। वे देश से बाहर जाकर अंग्रेजों के शत्रुओं से सहायता लेने की योजना बनाते हैं।
वेश बदलकर निकलना: एक दिन वे पठान मौलवी का वेश धारण कर, अपना नाम जियाउद्दीन रखकर पुलिस की आँखों में धूल झोंककर घर से निकल पड़ते हैं।
विदेश यात्रा: वे पेशावर, काबुल और रूस होते हुए जर्मनी पहुँचते हैं।
आज़ाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व: जर्मनी में वे हिटलर से मिलते हैं। वहाँ से वे जापान जाते हैं और रासबिहारी बोस द्वारा स्थापित 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का नेतृत्व सँभालते हैं। वे सेना को पुनर्गठित करते हैं और भारत की ओर कूच करने का निश्चय करते हैं।
इस सर्ग में कवि ने सुभाष चन्द्र बोस के अदम्य साहस, बुद्धि-कौशल और दृढ़ संकल्प का सजीव चित्रण किया है।