Question:

“इसे ‘सैक्स’, ‘सार्त्र’ भी नहीं बयान कर सकते” — ‘बिस्कोहर की माटी’ पाठ में यह कथन किस संदर्भ में कहा गया है? इसका क्या आशय है? इस संदर्भ में अपने विचार स्पष्ट कीजिए। 
 

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गाँव की माटी कोई ‘थ्योरी’ नहीं, वह तो ‘स्मृति’ और ‘संवेदना’ की ज़मीन है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह कथन लेखक द्वारा ग्रामीण अनुभव की उस गहराई और सजीवता की अभिव्यक्ति के रूप में किया गया है, जिसे पश्चिमी दार्शनिक या मनोविश्लेषक जैसे ‘सैक्स’ और ‘सार्त्र’ जैसे विचारक भी ठीक से नहीं समझा सकते।
‘बिस्कोहर की माटी’ पाठ में यह वाक्य उस क्षण आता है जब लेखक गाँव की मिट्टी, उसकी गंध, उसके रिश्तों और भावनाओं को अनुभव करता है।
आशय: इस कथन का आशय है कि कुछ अनुभूतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल जिया जा सकता है — उनका विश्लेषण या दर्शनशास्त्र से विवेचन नहीं किया जा सकता। लेखक यह मानता है कि बिस्कोहर की माटी की आत्मीयता, गाँव की भाषा, संबंधों की ऊष्मा और जीवन की लय कोई भी सिद्धांतवादी व्यक्ति नहीं समझ सकता — जब तक वह स्वयं उसमें डूब न जाए।
विस्तार: सैक्स और सार्त्र जैसे दार्शनिक भले ही मानव-व्यवहार और अस्तित्ववाद को गहराई से समझते हों, लेकिन गाँव की मिट्टी, भाषा, और अनुभवों में जो “रस” और “गंध” है — वह विश्लेषण नहीं, आत्मीयता का विषय है। लेखक यह भी इंगित करता है कि भारतीय ग्रामीण चेतना पश्चिमी बौद्धिकता से भिन्न है — वहाँ तर्क है, यहाँ भाव है।
व्यक्तिगत विचार: यह कथन हमें यह सिखाता है कि संस्कृति और संवेदना को “महसूस” किया जाता है, “समझाया” नहीं। बिस्कोहर की माटी एक प्रतीक बन जाती है उस जीवनशैली का जो आज की आधुनिकता में खोती जा रही है।
निष्कर्ष: लेखक यह बताना चाहता है कि कुछ चीज़ें बुद्धि से नहीं, हृदय से समझी जाती हैं — जैसे गाँव की माटी, उसकी गंध और उसमें रचे-बसे रिश्ते।
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