'रश्मिरथी' खण्डकाव्य में अर्जुन का चरित्र एक महान धनुर्धर, कर्तव्यनिष्ठ योद्धा और धर्म के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अर्जुन केवल अपनी युद्ध-कला और वीरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी नैतिकता और धर्म के प्रति अडिग विश्वास के लिए भी प्रसिद्ध है।
अर्जुन की वीरता और धनुर्विद्या: अर्जुन एक महान धनुर्धर था, जिसने अपनी शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य से प्राप्त की। वह अद्वितीय युद्ध-कौशल और अपार शक्ति का स्वामी था।
अर्जुन का धर्म और कर्तव्य-बोध: अर्जुन सदैव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलता है। महाभारत के युद्ध में उसने अधर्म के विरुद्ध युद्ध किया और अपनी नैतिकता को सर्वोपरि रखा।
कर्ण और अर्जुन का संघर्ष: 'रश्मिरथी' में कर्ण और अर्जुन के मध्य युद्ध केवल भौतिक शक्ति का नहीं, बल्कि उनके चरित्रों और आदर्शों का भी संघर्ष है। अर्जुन को श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन प्राप्त था, जिससे वह विजयी हुआ।
अर्जुन की मानसिक दशा: महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन मानसिक रूप से विचलित हो जाता है, लेकिन श्रीकृष्ण के गीता उपदेश से वह अपने कर्तव्य को समझता है और धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करता है।
अर्जुन केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक ऐसा पात्र है जो संघर्षों के बीच भी अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करता है। वह वीरता, धैर्य और आत्मसंयम का प्रतीक है।