'प्रेम और ममता की दुहाई व्यर्थ है' - यह पंक्ति किस संदर्भ में कही गई है?
यह पंक्ति उस संदर्भ में कही गई है जब श्रोता (पुत्री) प्रेम और ममता की बातें तो कर रही थी, लेकिन व्यवहार में वह उस 'विजातीय' बहू को अपने घर नहीं ला सकती थी। पिता कह रहे हैं कि जब तुम उस नीची श्रेणी की बहू को घर नहीं ला सकती, तब तक केवल प्रेम और ममता की दुहाई देना व्यर्थ है। प्रेम और ममता केवल शब्दों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहार में दिखाना चाहिए। यहाँ पिता समाज के पाखंड पर कटाक्ष कर रहे हैं।
श्रोता किन संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी?
श्रोता (पुत्री) निम्नलिखित संस्कारों के बंधन में जकड़ी हुई थी:
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जातिगत संस्कार: वह जाति-प्रथा के बंधन में बंधी थी, जहाँ ऊँच-नीच का भेद बहुत गहरा था।
सामाजिक रूढ़ियाँ: समाज में प्रचलित रूढ़िवादी परंपराओं और मान्यताओं से वह मुक्त नहीं हो पा रही थी।
पारिवारिक मर्यादाएँ: परिवार में स्थापित मर्यादाओं और नियमों के कारण वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही थी।
लोक-लाज का भय: समाज में क्या कहेंगे, इस भय ने उसे जकड़ रखा था।
पूर्वाग्रह: उसमें भी वही पूर्वाग्रह थे जो समाज में व्याप्त थे, भले ही वह प्रेम और ममता की बात करती हो।
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