Question:

दिए गए संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ–सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए : 

(क) किंचिद् गुरुतरं भूमेः किंचिद् उच्चतरं च खात् ? 
किंचिद् शीघ्रतरं वातात् किंचिद् बहुतरं तृणात् । 
माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा । 
मनः शीघ्रतरं वातात् चिन्ता बहुतरी तृणात् ॥ 
अथवा 
(ख) हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जितवा वा भोक्ष्यसे महीम् । 
निराशिर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ 
 

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संदर्भ–सहित अनुवाद लिखते समय — संदर्भ, शब्दार्थ, भावार्थ और संदेश चारों भाग स्पष्ट रूप से लिखें। इससे उत्तर पूर्ण और उच्च–स्तरीय बनता है।
Updated On: Oct 28, 2025
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Solution and Explanation

(क) पद्यांश का संदर्भ:
यह श्लोक संस्कृत के एक प्रसिद्ध नीति–शास्त्रीय ग्रंथ से लिया गया है, जिसमें विभिन्न वस्तुओं की तुलना के माध्यम से जीवन–संदेश दिया गया है। इसमें माता, पिता, मन और चिंता की विशेषताओं को बताकर उनके महत्व और प्रभाव को दर्शाया गया है।
शब्दार्थ:
गुरुतरम् — अधिक भारी, उच्चतरम् — अधिक ऊँचा, शीघ्रतरम् — अधिक तेज, बहुतरम् — अधिक, भूमेः — पृथ्वी से, वातात् — वायु से, तृणात् — घास से।
भावार्थ:
इस श्लोक में कवि कहता है — "पृथ्वी से भारी माता है, गड्ढे से ऊँचा पिता है, वायु से तेज मन है और घास से भी अधिक चिंता होती है।"
अर्थात् माता का स्थान पृथ्वी से भी अधिक महान है, पिता का स्थान सब से ऊँचा है, मन की गति वायु से भी तेज है और चिंता इतनी अधिक होती है कि वह सबको पीछे छोड़ देती है।
संदेश:
यह श्लोक जीवन–मूल्यों की शिक्षा देता है — माता–पिता के महत्व को समझना चाहिए, मन को नियंत्रित रखना चाहिए और अत्यधिक चिंता से बचना चाहिए।
(ख) पद्यांश का संदर्भ:
यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय से लिया गया है। यह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्धभूमि में दिया गया उपदेश है।
शब्दार्थ:
हतः — मारे जाने पर, प्राप्स्यसि — प्राप्त करेगा, स्वर्गम् — स्वर्ग, जितवा — जीतने पर, भोक्ष्यसे — भोगेगा, महीम् — पृथ्वी, निराशिः — बिना आशा के, निर्ममः — ममता रहित, युध्यस्व — युद्ध कर, विगतज्वरः — भय और मोह से रहित।
भावार्थ:
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — "यदि तू युद्ध में मारा जाएगा तो स्वर्ग प्राप्त करेगा, और यदि विजयी होगा तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिए आशा–ममता को छोड़कर, निडर होकर युद्ध कर।"
संदेश:
यह श्लोक कर्मयोग का उपदेश देता है। मनुष्य को फल की चिंता किए बिना, अपने कर्तव्य का पालन निडर होकर करना चाहिए। यही सच्चा धर्म है।
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