Question:

‘बाज़ार में कभी–कभी आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है।’ — इस कथन को उदाहरण सहित ‘बाज़ार–दर्शन’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए। 
 

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जब पाठ में सामाजिक यथार्थ या उपभोक्तावाद का विश्लेषण हो, तो व्यक्तिगत अनुभवों और बाजार-प्रवृत्तियों के उदाहरण ज़रूर शामिल करें।
Updated On: Jan 15, 2026
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Solution and Explanation

‘बाज़ार–दर्शन’ पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि बाज़ार की संरचना ऐसी होती है जहाँ ग्राहक की आवश्यकता को पहचान कर उसे नियंत्रित किया जाता है। लेखक ने बताया कि कैसे कभी-कभी ग्राहकों की आवश्यकताएँ ही उनके शोषण का कारण बन जाती हैं।
उदाहरणस्वरूप, जब लेखक मुँह दिखाई की रस्म के लिए चाँदी की पायल ख़रीदने बाज़ार जाते हैं, तो उन्हें यह अनुभव होता है कि दुकानदार उनकी मजबूरी को भाँपकर दाम अधिक लेते हैं। आवश्यकतानुसार वस्तु की गुणवत्ता या मूल्य में हेरफेर किया जाता है।
इस प्रकार बाज़ार केवल आवश्यकता की पूर्ति का नहीं, बल्कि उपभोक्ता की भावनात्मक, सामाजिक या पारिवारिक मजबूरी का लाभ उठाकर अधिक लाभ कमाने का माध्यम बन जाता है। यहीं पर आवश्यकता शोषण का रूप धारण कर लेती है।
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