तुलसी के हृदय में यह डर है कि कहीं वह अपनी साधना और धर्म से भटक न जाएं। वह अपनी आत्म-उन्नति और धर्मिक उद्देश्य में सच्चे बने रहें, यह उनकी सबसे बड़ी चिंता है। तुलसीदास जी का जीवन और उनके काव्य में यह भावना प्रकट होती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य धर्म और भक्ति में अडिग रहना है।
उनके लिए साधना केवल बाहरी कर्मों का पालन नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और मानसिक स्थिरता की प्रक्रिया है। उनका यह डर इसलिए गहरा है क्योंकि वे जानते हैं कि जीवन में अनेक विकर्षण और प्रलोभन होते हैं जो व्यक्ति को सत्य और साधना से भटका सकते हैं।
तुलसीदास जी के अनुसार, जीवन का उद्देश्य धर्म के पथ पर चलना है और इस पथ पर चलने के लिए मानसिक दृढ़ता, भक्ति और सच्ची साधना की आवश्यकता होती है। उनका यह डर इस बात को स्पष्ट करता है कि भक्ति और धर्म में स्थिरता बनाए रखना, अत्यधिक कठिन होता है, क्योंकि संसार के भौतिक सुख और संवेग मनुष्य को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
इसलिए, तुलसीदास जी का मुख्य भय यह था कि कहीं उनका मन इन सांसारिक आकर्षणों में न खो जाए और वे अपनी साधना और धर्म के मार्ग से भटक जाएं। यह विचार हमें यह सिखाता है कि जीवन में वास्तविक सुख और शांति केवल धर्म और भक्ति के पथ पर चलते हुए प्राप्त की जा सकती है।