Question:

‘मुझ भाग्यहीन की तू संबल’ — कवि स्वयं को भाग्यहीन क्यों कह रहा है? उसका संबल कौन है? 
 

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माँ के विषय में लिखते समय उसके संरक्षण, प्रेरणा और आत्मिक संबल देने वाले रूप का वर्णन करें। कवि की व्यक्तिगत व्यथा और माँ की भूमिका को भावपूर्ण भाषा में जोड़ना आपकी व्याख्या को और प्रभावी बनाता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

इस कविता में कवि (मैथिलीशरण गुप्त) स्वयं को “भाग्यहीन” कह रहा है क्योंकि उसे अपने जीवन में केवल संघर्ष, पीड़ा और निराशा ही दिखाई देती है। उसे संसार में कहीं भी स्थायित्व, सुख या सहयोग का अनुभव नहीं होता। जीवन की विषम परिस्थितियों में वह अकेला अनुभव करता है।

ऐसी स्थिति में उसका संबल केवल एक है — “माँ”। वह माँ को ही अपनी आशा, प्रेरणा और जीवन की ऊर्जा मानता है। माँ की करुणा, ममता और सहारा ही उसके जीवन की एकमात्र शक्ति है। कवि माँ के प्रति अत्यंत भावुक होकर कहता है कि यदि तू नहीं होती, तो मेरा जीवन निरर्थक और अंधकारमय होता।

इस प्रकार, माँ के रूप में कवि को जो आत्मिक संबल मिलता है, वही उसे “भाग्यहीनता” की पीड़ा से बाहर निकालता है और जीवन में दृढ़ता देता है।
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