'जूठन' एक आत्मकथा है, जिसमें लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी जातिवाद के कारण उत्पन्न कठिनाइयों और भेदभाव को प्रस्तुत किया है। वह बताते हैं कि कैसे बचपन में उन्हें समाज के निचले स्तर पर रहते हुए अपमान और शोषण का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी आत्मकथा के माध्यम से अपने संघर्ष और जातिवाद के खिलाफ विद्रोह को व्यक्त किया है।
इस आत्मकथा में लेखक ने अपने अनुभवों के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे जातिवाद समाज में एक गहरी दीवार की तरह खड़ा होता है, जो व्यक्ति को उसकी असल पहचान और सम्मान से वंचित करता है। वाल्मीकि जी ने अपने जीवन के उन कठिन दिनों का चित्रण किया है, जब उन्हें केवल उनकी जाति के कारण असंख्य अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा।
हालांकि, जूठन केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी है। यह कृति यह बताती है कि समाज में व्याप्त जातिवाद केवल व्यक्तिगत जीवन को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज को प्रभावित करता है। इसके माध्यम से वाल्मीकि जी ने इस विकृति के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और इसे समाप्त करने का आह्वान किया।
लेखक ने न केवल अपनी दर्दनाक यात्रा का वर्णन किया, बल्कि समाज में व्याप्त इस असमानता के खिलाफ जागरूकता फैलाने का भी प्रयास किया है। 'जूठन' केवल एक आत्मकथा नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए एक प्रेरणा बन गई है।