यह अवतरण हमें समाज की मानसिकता और जेंडर से संबंधित रूढ़ियों की ओर संकेत करता है। इसमें कहा गया है कि जब पुरुष स्त्रियों से जुड़े कुछ गुणों को अपनाता है, तो वह समाज में स्त्री जैसी छवि धारण करने से डरता है।
समाज में पुरुषों से उम्मीद की जाती है कि वे साहसी, कठोर, और तर्कसंगत हों, जबकि स्त्रियों को अधिक भावनात्मक, स्नेहपूर्ण, और कोमल समझा जाता है। यह सामाजिक पूर्वाग्रह अक्सर लिंग आधारित भेदभाव को जन्म देता है। इस अवतरण में यह दिखाया गया है कि जब पुरुष इन पारंपरिक गुणों के विपरीत भावनात्मक या कोमल पक्ष को अपनाते हैं, तो उन्हें समाज में नकारात्मक नजरिए से देखा जाता है।
यह पंक्ति इस तथ्य को उजागर करती है कि हमारी सामाजिक संरचना और मान्यताएँ इस हद तक पुरुष और स्त्री के बीच अंतर करती हैं, कि जब एक पुरुष स्त्री जैसी विशेषताएँ अपनाता है, तो उसे समाज में स्वीकृति नहीं मिलती। यह सोच न केवल व्यक्तियों की मानसिक स्वतंत्रता को सीमित करती है, बल्कि जेंडर समानता के मार्ग में भी बाधा उत्पन्न करती है।
इस प्रकार की रूढ़िवादी सोच को चुनौती देने की आवश्यकता है, ताकि हर व्यक्ति को अपनी पहचान और व्यक्तित्व को व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिल सके। समाज को यह समझना चाहिए कि गुण और व्यवहार लिंग के आधार पर सीमित नहीं होते, और एक समावेशी समाज तभी संभव है जब हम इन पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर खुले विचार अपनाएँ।