हर नागरिक को संविधान द्वारा दिए गए अधिकार उसकी स्वतंत्रता, गरिमा और विकास की गारंटी होते हैं। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार जैसे — समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शिक्षा और संस्कृति का अधिकार, आदि हमें एक गरिमामय जीवन जीने का अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है।
वर्तमान समय में देखा गया है कि लोग अपने अधिकारों को तो जानते हैं और उनकी माँग भी करते हैं, किंतु अपने कर्तव्यों को निभाने में उदासीनता दिखाते हैं। नागरिकों को यह समझना होगा कि यदि वे देश से कुछ अपेक्षा करते हैं, तो देश को भी उनसे जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है।
हमारे कर्तव्यों में संविधान का पालन करना, राष्ट्रीय ध्वज और प्रतीकों का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना, महिलाओं के प्रति सम्मानभाव रखना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, और करों का ईमानदारी से भुगतान करना शामिल हैं। जब हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तभी समाज में संतुलन, अनुशासन और विकास संभव होता है।
एक जागरूक नागरिक वही होता है जो अधिकारों का उपभोग करते हुए अपने कर्तव्यों को भी पूरी निष्ठा से निभाता है। विद्यालय में छात्र का कर्तव्य पढ़ाई करना है, तो शिक्षक का कर्तव्य पढ़ाना। इसी प्रकार, प्रत्येक भूमिका के साथ कर्तव्य जुड़ा है।
अतः यह स्पष्ट है कि अधिकार और कर्तव्य एक गाड़ी के दो पहिये हैं — दोनों के समन्वय से ही लोकतंत्र सफल और समाज समृद्ध बनता है।