तकनीक ने जहाँ जीवन को आसान बनाया है, वहीं अपराधियों को भी नए-नए तरीके दे दिए हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ इसी तकनीकी युग की एक खतरनाक देन है, जिसमें आम नागरिक को मानसिक भय दिखाकर साइबर ठग ठगी का शिकार बनाते हैं।
इसमें व्यक्ति को कॉल या वीडियो कॉल द्वारा पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर डराया जाता है — कि उसने कोई अपराध किया है, उसका नाम किसी केस में दर्ज है, या वह कानून का उल्लंघन कर चुका है।
इसके बाद व्यक्ति को ‘डिजिटल माध्यम’ से गिरफ़्तारी का डर दिखाया जाता है — जैसे कि कैमरे के सामने बने रहना होगा, बैंक विवरण साझा करना होगा, जुर्माना तुरंत भरना होगा, आदि।
ठग वीडियो कॉल पर पुलिस वर्दी या सरकारी चिन्हों का दुरुपयोग कर विश्वास अर्जित करते हैं और फिर व्यक्ति को डराकर पैसा वसूलते हैं।
यह अपराध मनोवैज्ञानिक नियंत्रण पर आधारित होता है, जिसमें व्यक्ति भय, शर्म या सामाजिक प्रतिष्ठा के डर से तत्काल निर्णय कर बैठता है।
इसका शिकार शिक्षित, तकनीकी जानकार और साधारण नागरिक — सभी हो सकते हैं।
इससे बचने के उपाय हैं:
कभी भी अनजान कॉल पर कोई व्यक्तिगत या बैंक जानकारी न दें, किसी भी प्रकार की डराने वाली भाषा पर प्रतिक्रिया न दें, और ऐसे मामलों को तुरंत साइबर क्राइम सेल में रिपोर्ट करें।
जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।
अतः डिजिटल अरेस्ट आधुनिक अपराध का नया रूप है, जिसका मुकाबला तकनीकी साक्षरता और मानसिक सतर्कता से ही किया जा सकता है।