List of top Questions asked in CBSE CLASS XII

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
कुटज के ये सुंदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं। जो कालिदास के काम आया हो उसे ज़्यादा इज़्ज़त मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इज़्ज़त तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली फेंक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया। हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता। उनकी फक्कड़ाना मस्ती कहीं गई नहीं। अच्छे-ख़ासे कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी विघ्नाश्रु सवार होते हैं कि गलती कर बैठते हैं। मन ख़राब हुआ होगा, लोगों की बेरुख़ी और बेक़द्री से सुबक गए होंगे – ऐसी ही मनःस्थिति में उन्होंने बेचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी।

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए: 
हर की पौड़ी पर साँझ कुछ अलग रंग में उतरती है। दीया-बाती का समय या कह लो आरती की बेला। पाँच बजे जो फूलों के दोने एक-एक रुपए के बिक रहे थे, इस वक्त दो-दो के हो गए हैं। भक्तों को इससे कोई शिकायत नहीं। इतनी बड़ी-बड़ी मनोकामना लेकर आए हुए हैं। एक-दो रुपए का मुँह थोड़े ही देखना है। गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वर्दी में मस्तेदी से घूम रहे हैं। वे सबको सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना कर रहे हैं। शांत होकर बैठिए, आरती शुरू होने वाली है। कुछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। स्पेशल आरती यानी एक सौ एक या एक सौ इक्यावन रुपए वाली। गंगा-तट पर हर छोटे-बड़े मंदिर पर लिखा है — ‘गंगा जी का प्राचीन मंदिर।’ पंडितगण आरती के इंतज़ाम में व्यस्त हैं। पीतल की नीलांजलि में सहस्त्र बातियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं।

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
ऊँचे टक्कर से गिरे 
बड़े-बड़े पियाय पत्ते 
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो – 
खिली हुई हवा आई, फिकी-सी आई, चली गई। 
ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते। 
कल मैंने जाना कि वसंत आया। 
और यह कैलेंडर से मालूम था 
अमुक दिन अमुक बार मधुमहीने की होगी पंचमी 
दफ़्तर में छुट्टी थी – यह था प्रमाण 
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था 
कि दहक-दहक दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल 
आम बौर आएँगे 
रंग रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के 
वे नंदन-वन होंगे यशस्वी 
मधुमस्त पिक भौर आदि अपना-अपना कृतित्व 
अवश्य करके दिखाएँगे 
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा 
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।