Comprehension

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए : 
अहिंसा का दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है और हिंसा का दूसरा रूप या दूसरा नाम स्वार्थ है, जो प्रायः भोग के रूप में हमारे सामने आता है। पर हमारी सभ्यता ने तो भोग भी त्याग से निकाला है और भोग भी त्याग में ही पाया जाता है। श्रुति कहती है — 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:'। इसी के द्वारा हम व्यक्ति–व्यक्ति के बीच का विरोध, व्यक्ति और समाज के बीच विरोध, समाज और समाज के बीच का विरोध, देश और देश के बीच के विरोध को मिटाना चाहते हैं। हमारी सारी नैतिक चेतना इसी तत्व से ओत–प्रोत है।

Question: 1

प्रस्तुत गद्यांश का शीर्षक लिखिए।

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शीर्षक लिखते समय यह ध्यान रखें कि वह गद्यांश के मुख्य विषय या भाव को पूरी तरह व्यक्त करे।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

प्रस्तुत गद्यांश का शीर्षक है — "अहिंसा"
यह गद्यांश अहिंसा के वास्तविक स्वरूप और उसके नैतिक महत्व को स्पष्ट करता है। इसमें बताया गया है कि अहिंसा केवल हिंसा का अभाव नहीं, बल्कि त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक है।
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Question: 2

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

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व्याख्या में रेखांकित अंश का शाब्दिक अर्थ, भावार्थ और उससे मिलने वाली शिक्षा तीनों को अवश्य लिखें।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

रेखांकित अंश में लेखक ने अहिंसा के गहरे दार्शनिक और नैतिक अर्थ को स्पष्ट किया है। इसमें बताया गया है कि अहिंसा केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि मानव की अंतरात्मा से उत्पन्न एक जीवन-दृष्टि है।
'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः' — यह उपनिषद् का सिद्धांत है जिसका अर्थ है — "त्याग के द्वारा ही भोग करो।" इस सिद्धांत में यह शिक्षा दी गई है कि मनुष्य को भोग करते समय भी संयम और त्याग का भाव बनाए रखना चाहिए।
लेखक ने कहा है कि त्याग ही अहिंसा का दूसरा रूप है। जब हम स्वार्थ, हिंसा, और भोग की प्रवृत्ति का त्याग करते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में अहिंसक बनते हैं। इसी त्याग और संयम से व्यक्ति-व्यक्ति के बीच का विरोध मिटता है।
इस प्रकार यह अंश बताता है कि समाज में एकता, सद्भाव और शांति की स्थापना तभी संभव है जब व्यक्ति त्याग और अहिंसा के भाव को अपनाता है। अहिंसा केवल वाणी या कर्म की नहीं, बल्कि विचारों की भी पवित्रता का नाम है।
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Question: 3

हमारे नैतिक सिद्धांतों में किस चीज़ को प्रमुख स्थान दिया गया है?

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ऐसे प्रश्नों में उत्तर देते समय 'मुख्य मूल्य' को पहले स्पष्ट रूप से बताएं और फिर उसके सामाजिक और नैतिक प्रभाव को समझाएं।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

हमारे नैतिक सिद्धांतों में त्याग और अहिंसा को प्रमुख स्थान दिया गया है।
भारतीय संस्कृति में त्याग को सर्वोच्च आदर्श माना गया है क्योंकि त्याग से ही व्यक्ति में संयम, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना विकसित होती है। भोग करने की प्रवृत्ति मनुष्य में स्वार्थ, लोभ और हिंसा को जन्म देती है, जबकि त्याग की भावना उसे विनम्र और नैतिक बनाती है।
अहिंसा को हमारे धर्म और नीति दोनों का आधार माना गया है। यह केवल शारीरिक हिंसा से बचने का नाम नहीं, बल्कि विचार, वाणी और आचरण में शुद्धता का परिचायक है। जब मनुष्य त्याग और अहिंसा का पालन करता है, तब उसके जीवन में संतुलन, शांति और करुणा की भावना उत्पन्न होती है।
इस प्रकार हमारे नैतिक सिद्धांतों का सार यही है कि — त्याग और अहिंसा ही मानवता का सर्वोच्च धर्म है, और इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति तथा समाज की वास्तविक उन्नति संभव है।
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