Comprehension

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए : 
दूसरी बात जो इस सम्बन्ध में विचारणीय है, वह यह है कि संस्कृति अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश का प्राण है। इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें और सब तरह की पहचान विविधताएँ हैं, वहाँ उन सबमें यह एकता है। इसी बात को ठीक तरह से पहचान लेने से बापू ने जनसाधारण को बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में क्रान्ति करने के लिए तत्पर करने के लिए इसी नैतिक चेतना का सहारा लिया था।

Question: 1

उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

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गद्यांश के स्रोत लिखते समय रचना का नाम और लेखक दोनों का उल्लेख अवश्य करें।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

यह गद्यांश 'राष्ट्रीयता और संस्कृति' पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हैं। उन्होंने इस पाठ में भारतीय संस्कृति की आत्मा — नैतिक चेतना — और उसकी एकता की भावना को स्पष्ट किया है।
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Question: 2

गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

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व्याख्या करते समय रेखांकित वाक्य का शाब्दिक अर्थ और उसमें निहित भाव दोनों को जोड़ें।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

रेखांकित अंश — "इसी नैतिक चेतना के सूत्र से हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं।" — का भाव यह है कि भारतीय समाज की एकता का मूल आधार उसकी नैतिक और सांस्कृतिक चेतना है।
हमारे देश में अनेक धर्म, जातियाँ और भाषाएँ हैं, परंतु इन सभी को जोड़ने वाला सूत्र है नैतिकता और मानवता की भावना। भारत के लोग विचारों और जीवन-शैली में भिन्न होते हुए भी एक समान संस्कृति और आचार-संहिता से बँधे हैं। यही नैतिक चेतना हमारे देश की आत्मा और शक्ति है।
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Question: 3

बापू ने क्रान्ति करने के लिए किसका सहारा लिया था?

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जब प्रश्न "किसका सहारा लिया" जैसा हो, तो उत्तर में केवल वस्तु नहीं, उसके उद्देश्य का भी उल्लेख करें।
Updated On: Oct 27, 2025
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Solution and Explanation

बापू (महात्मा गाँधी) ने क्रान्ति करने के लिए नैतिक चेतना और जनमानस की आंतरिक शक्ति का सहारा लिया। उन्होंने यह समझा कि देश की स्वतंत्रता हिंसा से नहीं, बल्कि जनसाधारण के आत्मबल और सत्य-अहिंसा के मार्ग से प्राप्त की जा सकती है।
उन्होंने जनसमूह को आत्मशक्ति, संयम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बापू के लिए यह क्रान्ति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और आत्मिक उत्थान की भी क्रान्ति थी।
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