निम्नलिखित काव्य पंक्तियों को पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:

(१) कारण लिखिए:
(१) आम्रवृक्ष की डाल सदा के लिए काट दी जाएगी -
(२) छायादार अशोक वृक्ष खंड-खंड हो जाएगा -
(२) उचित मिलान कीजिए:
\[\begin{array}{|l|l|} \hline \text{(१) वृक्ष} & \text{टहनी} \\ \text{(२) ग्राम} & \text{राह} \\ \hline \text{(३) पथ} & \text{गाँव} \\ \hline \text{(४) डाल} & \text{पेड़} \\ \hline \end{array}\]
(३) 'युद्ध के दुष्परिणाम' इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए।
(१) कारण:
(नोट: काव्य पंक्तियाँ अनुपलब्ध होने के कारण, संदर्भ के आधार पर तार्किक कारण दिए गए हैं।)
(१) आम्रवृक्ष की डाल सदा के लिए काट दी जाएगी: युद्ध या मानवीय लालच के कारण, जैसे कि संसाधनों के लिए वृक्षों का विनाश, जो स्थायी नुकसान पहुँचाता है।
(२) छायादार अशोक वृक्ष खंड-खंड हो जाएगा: पर्यावरण विनाश या प्राकृतिक आपदाओं के कारण, जो पेड़ की शांति और सुंदरता को नष्ट कर देता है।
(२) उचित मिलान:
\[\begin{array}{|l|l|} \hline \text{(१) वृक्ष} & \text{पेड़} \\ \text{(२) ग्राम} & \text{गाँव} \\ \hline \text{(३) पथ} & \text{राह} \\ \hline \text{(४) डाल} & \text{टहनी} \\ \hline \end{array}\]
- वृक्ष-पेड़: समानार्थी, दोनों पौधों को दर्शाते हैं।
- ग्राम-गाँव: समानार्थी, ग्रामीण क्षेत्र को संदर्भित करते हैं।
- पथ-राह: समानार्थी, मार्ग को दर्शाते हैं।
- डाल-टहनी: समानार्थी, पेड़ की शाखाओं को संदर्भित करते हैं।
(३) युद्ध के दुष्परिणाम:
युद्ध मानवता के लिए अभिशाप है। यह जीवन, संपत्ति और पर्यावरण का विनाश करता है। युद्ध से गरीबी, भुखमरी और मानसिक आघात बढ़ता है। यह सामाजिक एकता को तोड़ता और परिवारों को बिखेरता है। शांति और सहयोग ही विकास का मार्ग है। (४४ शब्द)
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाण भारती | तस्या हिं मधुरं काव्यं तस्मादपि सुभाषितानि ।।
शान्त, स्निग्ध ज्योत्सना उज्वल । अपलक अनंत नीरव भू-तल !
सैकत- शय्या पर दुग्ध-धवल तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल,
लेटी हैं श्रांत, क्लांत, निश्चल ।
तापस- बाला-सी गंगा कल निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल,
लहरें उर पर कोमल कुंतल ।
गोरे अंगों पर सिहर सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर
चंचल अंचल सा नीलाम्बर ।
साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी - विभा से भर सिमटी हैं वर्तुल मृदुल लहर ।
चाँदनी रात का प्रथम प्रहर, हम चले नाव लेकर सत्वर ।
'चाँद का मुँह टेढ़ा है' रचना की विधा है।
'मैं नीर भरी दुःख की बदली' काव्य पंक्ति के रचनाकार हैं।
'खड़ी बोली' का प्रथम महाकाव्य है।