'ओ सदानीरा' एक अत्यंत प्रसिद्ध और विचारशील निबंध है, जिसे हिंदी साहित्यकार मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है। यह निबंध नदियों के महत्व और उनके समाज में योगदान पर गहरे और विस्तृत विचार प्रस्तुत करता है। गुप्त जी ने इस निबंध के माध्यम से नदियों को केवल जल का स्रोत ही नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, सभ्यता और समाज के अनेक पहलुओं से जोड़कर प्रस्तुत किया है।
इस निबंध में लेखक ने नदियों को जीवनदायिनी के रूप में चित्रित किया है। उनका मानना है कि नदियाँ न केवल जल प्रदान करती हैं, बल्कि यह मानवता के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे कृषि, परिवहन, उद्योग, और जलवायु के संतुलन के लिए भी आवश्यक हैं। गुप्त जी का कहना है कि नदियाँ हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं।
लेखक ने नदियों के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को भी उकेरा है। भारतीय संस्कृति में नदियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का प्रतीक रही हैं। गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु जैसी नदियाँ भारतीय समाज और धार्मिक जीवन के अनिवार्य अंग रही हैं। गुप्त जी ने नदियों के संदर्भ में भारतीय सभ्यता के इतिहास, धार्मिक अनुष्ठानों, और सांस्कृतिक परंपराओं को भी महत्वपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है।
इसके अलावा, गुप्त जी ने नदियों के संरक्षण की आवश्यकता को भी जोर दिया है। नदियाँ जिस तरह से प्रदूषित हो रही हैं और उनका जल स्तर घट रहा है, यह हमारे पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट उत्पन्न कर रहा है। लेखक ने यह चेतावनी दी है कि यदि हम नदियों की महत्ता को न समझें और उनका संरक्षण न करें, तो हमारे लिए आने वाले समय में यह एक बड़ी समस्या बन सकती है।
इस निबंध में गुप्त जी ने नदियों को 'सदानीरा' के रूप में संदर्भित किया है, जो न केवल समाज के लिए आवश्यक हैं, बल्कि जीवन के प्रत्येक पहलू को पोषित करने वाली और जीवन की निरंतरता में सहायक हैं। यह निबंध नदियों के महत्व को पुनः स्थापित करता है और हमारे समाज में उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का एक सशक्त माध्यम है।