निर्णय-प्रक्रिया:
परिवार नियोजन, जन्म-अंतराल, संस्थागत प्रसव जैसे फैसले प्रायः पुरुष/बुज़ुर्ग लेते हैं; महिलाओं की सहमति औपचारिक रह जाती है।
पुत्र-प्राथमिकता:
वंश, उत्तराधिकार व वृद्धावस्था-सुरक्षा की धारणाएँ बेटियों के प्रति निवेश घटाती हैं; चयनात्मक गर्भपात/देखभाल-भेद जोखिम बढ़ाते हैं।
स्वास्थ्य/पोषण:
गर्भावस्था जाँच, आयरन-फोलिक एसिड, टीकाकरण, विश्राम—सांस्कृतिक नियम व काम-भार के कारण अधूरे रहते हैं; प्रसवोत्तर देखभाल व मानसिक स्वास्थ्य पर कम ध्यान।
परिवर्तन-रणनीति:
महिलाओं की शिक्षा/रोज़गार, पुरुष-भागीदारी वाले कार्यक्रम, सामुदायिक संवाद, कानूनी प्रवर्तन (पीसीपीएनडीटी), और स्वास्थ्य-तंत्र की महिलाओं-केंद्रित सेवाएँ—ये मिलकर पितृसत्तात्मक भेद को घटाते हैं।