स्पष्टीकरण:
चारताल एक 12 मात्राओं की ताल है, जिसे आमतौर पर ध्रुपद संगीत में प्रयोग किया जाता है। यह ताल भारतीय शास्त्रीय संगीत की महत्वपूर्ण तालों में से एक है। चारताल में कुल 6 विभाग होते हैं, और प्रत्येक विभाग में 2 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार, चारताल की कुल संरचना 12 मात्राओं की होती है।
चारताल की विशेषता यह है कि इसकी संरचना ताली और खाली (खाली के रूप में "लय" या "वक्त" का अनुभव होता है) के क्रम में होती है। इसमें ताली की स्थिति प्रत्येक विभाग के अंत में होती है, और खाली प्रत्येक विभाग के बीच में होता है। ताली और खाली का यह स्वरूप चारताल को एक विशिष्ट लयबद्धता और गतिशीलता प्रदान करता है, जिससे इसका अनुभव और भी आकर्षक बनता है।
ध्रुपद संगीत में, चारताल का प्रयोग रागों की प्रस्तुति में बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह ताल राग के स्वर और लय को अच्छी तरह से सुसंगत बनाता है और संगीत के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण बनाता है। इसके अतिरिक्त, चारताल के द्वारा गायक और वादक एक विशेष तालबद्धता और अनुशासन का पालन करते हुए संगीत की प्रस्तुति करते हैं।
इस प्रकार, चारताल केवल एक ताल नहीं, बल्कि एक लयात्मक संरचना है, जो शास्त्रीय संगीत में गहरे प्रभाव और ताजगी का संचार करती है।