Question:

‘अपना मालवा .....’ पाठ में वर्णित जल संचय के तरीकों का वर्णन करते हुए लिखिए कि विकास की दौड़ ने उन पर कैसा प्रभाव डाला है? इस प्रभाव से किस प्रकार बचाव किया जा सकता है? 
 

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जल संकट केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती भी है — इसका समाधान परंपरा और नवाचार के मेल से संभव है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

‘अपना मालवा’ पाठ में लेखक ने मध्य भारत की उस पारंपरिक जल संस्कृति का वर्णन किया है जो वर्षों तक स्थानीय समाज की जीवनरेखा बनी रही। यहाँ के लोग वर्षा जल को रोकने, सहेजने और फिर उपयोग में लाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विविध जल संरचनाएँ बनाते थे — जैसे तालाब, हौद, कुएँ, बावड़ी, सोखता आदि।
इन जल स्रोतों का रख-रखाव सामूहिक दायित्व माना जाता था। पानी का मूल्य समझा जाता था। यह समाज और पर्यावरण के बीच गहरा संबंध बनाता था।
लेकिन जैसे-जैसे विकास की दौड़ शुरू हुई, आधुनिक निर्माण, ट्यूबवेल संस्कृति, कंक्रीट का विस्तार और भूमिगत जल दोहन ने इन परंपराओं को नष्ट कर दिया। लोग वर्षा जल के महत्व को भूलने लगे, गाँवों की पारंपरिक जल संरचनाएँ सूख गईं, और जल संकट बढ़ने लगा।
विकास की इस अंधी दौड़ ने प्रकृति और समाज के मध्य समन्वय को तोड़ा। जहाँ पहले लोग पानी के लिए वर्षा की प्रतीक्षा करते थे, अब मोटर-पंप पर निर्भरता बढ़ गई।
इस संकट से बचने के लिए हमें फिर से जल संरक्षण की पारंपरिक तकनीकों की ओर लौटना होगा — रूफ रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, समाज-आधारित तालाब पुनर्निर्माण, वृक्षारोपण, भूजल रिचार्ज और जनजागरूकता के माध्यम से।
इसके साथ ही शहरी योजनाओं में जल-संरक्षण को अनिवार्य करना, और ‘प्राकृतिक संसाधन जन-संपत्ति हैं’ — इस भाव को जाग्रत करना आवश्यक है।
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