Question:

महामारी के समय ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए संजीवनी का काम कैसे करती थी?

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ढोलक की आवाज़ = आशा + साहस + सामूहिकता महामारी में जीवन का प्रतीक
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Solution and Explanation

Concept: यह प्रश्न फणीश्वरनाथ रेणु के आंचलिक साहित्य से संबंधित है, जिसमें ग्रामीण जीवन की संवेदनाएँ और सामूहिक भावनाएँ जीवंत रूप में चित्रित होती हैं। महामारी जैसे संकट के समय गाँव में भय, निराशा और असहायता का वातावरण छा जाता था। ऐसे समय में ढोलक की आवाज़ आशा और जीवन का प्रतीक बन जाती थी।
व्याख्या: महामारी के समय ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए संजीवनी का काम निम्न प्रकार से करती थी—
आशा का संचार: ढोलक की ध्वनि सुनकर लोगों को लगता था कि जीवन अभी शेष है और सामान्यता लौट सकती है।
भय का निवारण: महामारी के कारण फैले सन्नाटे और डर को यह आवाज़ तोड़ देती थी।
सामूहिकता की भावना: ढोलक की थाप लोगों को यह एहसास कराती थी कि वे अकेले नहीं हैं, पूरा गाँव साथ है।
जीवन के उत्साह का प्रतीक: संगीत जीवन और उल्लास का प्रतीक है, जो निराश मन में ऊर्जा भर देता था।
मानसिक संबल: यह ध्वनि लोगों को मानसिक शक्ति और धैर्य प्रदान करती थी।
निष्कर्ष: इस प्रकार महामारी के भयावह वातावरण में ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए आशा, साहस और जीवन का संदेश लेकर आती थी। वह निराशा के बीच संजीवनी की तरह काम करती थी और लोगों के मन में जीने की शक्ति भर देती थी।
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