'च' ध्वनि का उच्चारण तालु से होता है। इसे तालव्य वर्ण कहा जाता है। जब इसे उच्चारित किया जाता है, तो जीभ तालु के पास जाती है और ध्वनि उत्पन्न होती है।
हिंदी और संस्कृत वर्णमाला में वर्णों को उनके उच्चारण के स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। तालव्य वर्ण वे होते हैं जिनका उच्चारण तालु अर्थात् मुख के ऊपर के हिस्से से होता है। 'च' ध्वनि भी इसी वर्ग में आती है।
जब हम 'च' का उच्चारण करते हैं, तो जीभ का अग्रभाग तालु के निकटस्पर्श में आता है, जिससे यह विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न होती है। यह व्यंजन स्पर्श और अघोष (unvoiced) है, अर्थात उच्चारण के दौरान वायु मार्ग कुछ समय के लिए बंद होता है, लेकिन कंठ से आवाज़ नहीं निकलती।
'च' ध्वनि का उच्चारण करते समय जीभ तालु से टकराती है, जिससे यह ध्वनि तालव्य वर्ग की श्रेणी में आती है। इसके अलावा, 'च' व्यंजन एक नासिका या घुनित वर्ण नहीं है, बल्कि एक साफ और स्पष्ट स्पर्श व्यंजन है जो भाषा के उच्चारण में विशेष महत्व रखता है।
इस प्रकार, 'च' ध्वनि की उत्पत्ति और उच्चारण की प्रक्रिया के आधार पर इसे तालव्य वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो हिंदी व्याकरण के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।